हृदय की भाषा 

कल्पवृक्ष

अपनी तरुणाई के अठ्ठारह सालों को अपने दुप्पटे के खूंटे से बाँधे धधकता यौवन लेकर…

आई थी वो अपने साथ सन्तरंगी उम्मीदों का उफ़ान लिए प्रेम का समंदर…

वो सभी पर्याप्त साधन लाई थी प्रेम के सरोवर में डूबा कर..

स्वयं महुआ का रस पीकर आई थी…

उन्मदित्त हो स्वयं को प्रेम में समर्पित करने को…

वो वारुणी से नहा कर आई थी उन्मत्त होने को…

उसने पारिजात भरे थे मुट्ठी भर

प्रेम को दुर्लभ बनाना चाहती थी

वो आई धीरे से किवाड़ खोला…

अपने मन का,

उसने लड़के को पुकारा

मन के भीतर,

उसने मौन होकर लड़के से कहाँ प्रेम करती हूँ तुमसे,

लड़का कुछ न सुन सका

लडक़ी न जाने कितनी बार कहती रही लड़के से,

करोगे मुझसे प्रेम?

लड़का शून्य को निहारता रहा

लड़की ने प्रेम का पारिजात रोपना चाहा लड़के के हृदय पर

लड़का घबरा कर दूर छिटक गया…

पारिजात के नन्हे-नन्हें फूल धरती के आँचल…

View original post 55 more words

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s