प्रेम

दिल अभी भरा नहीं

मेरी आकाशगंगा के सूर्य हो तुम
सौरमण्डल की तरह
गुरुत्वाकर्षण से चिपके मेरे अंश
आकाशगंगा के सर्पिल मार्ग में
रहस्यमय है प्रेम !

प्रेम तो सदैव श्रापित और लांछित रहा
प्रेम में डूबी शकुंतला बच न सकी
दुर्वासा के श्राप से
लांछित हुई अहिल्या प्रेम में सती होकर
प्रस्तर में ढल गई !

आत्मा के सहज स्वभाव प्रेम का
परिणाम इस धरती पर
रुदन क्यों?

शुभा मिश्रा
7.8.21

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