तिलिस्म

दिल अभी भरा नहीं

अधिचेतन मन में
पृथ्वी की समस्त ध्वनियाँ अंकित हैं
वैसे ही जैसे तुम्हारा मौन
पिघलता रहता है मेरे मन में
सप्त सुर बनकर ।

सुख अंकित हो जाते हैं ह्रदयगुफ़ा में
और दुख कचोटता रहता है
पीड़ायुक्त मवाद की तरह
शुष्क अश्रु बनकर ।

विहँस उठता है मन
आहट पर मृत्यु के वरण की
उसी तरह जैसे मिट्टी में पड़े बीज
के अंकुरण की सूचना पर पृथ्वी
ध्यानमग्न हो जाती है संतृप्त होकर ।

अंतरिक्ष में विराजे देव
ग्रहण करते हैं मन्त्रपुरित नैवेद्य
आकाश बरसा देता है प्रेम
पृथ्वी समेट लेती है ध्वनियाँ
तिलिस्म क्यों बन जाते हैं सुख दुख बार बार ।

शुभा मिश्रा
21.6.21

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